Tuesday, 2 July 2013

ना तुम थे कभी मेरे करीब....ना तुम्हे ही मैंने बनाया नसीब...

पाल रहा था एक सपना
जाने कितने साल से
आज आखिर निकल गया
वो तीर जो था कमान पे

चलो ये भी खूब रही
आखिर आपने ही कही
वो सपना था
उसे भूल जा
जान ले है यथार्थ क्या

मैं हूँ वो अप्सरा
जो आ सकती है सिर्फ ख्वाब में
मैं वो निराला फूल हूँ
जो खिला है गैर के बाग़ में

तुम नहीं मेरी दुनियाँ से हो
फिर क्यों दुखी हो ये कहो

क्यों आज तक हो पकडे
तुम मेरी परछाई को
क्यों बनाये बैठे हो तुम
इस किले हवाई को

मैं खुश हूँ अपनों के बीच
रही हूँ जिस ज़मीन को सींच
वो ही मेरा देश है
तू भी जा अब अपनों के बीच
क्यों बनाया ये भेष है

बीत गया वो काल है
और आज ये एहम सवाल है
ना तुम थे कभी मेरे करीब
ना तुम्हे ही मैंने बनाया नसीब

हम सिर्फ एक सफ़र में थे
और हँसके थोड़ी बात की
मेरा मकाम जब आगया
तो मैं वक़्त की मोहताज थी

चलो ये भी खूब रही
आखिर आपने ही कही

"वैभव मैत्रेय"

1 comment:


  1. बीत गया वो काल है
    और आज ये एहम सवाल है
    ना तुम थे कभी मेरे करीब
    ना तुम्हे ही मैंने बनाया नसीब ........ bohat khoob. sundar abhivyakti

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