Friday, 23 December 2011

जुदाई

तुम कहते हो हम गर जुदा हो जायेंगे तुम होगे थोडा मसरूफ और हम भूल जायेंगे

क्या मुमकिन है कभी करना साँसों को साँसों से जुदा
क्या मुमकिन है कभी करना आँखों से खवाब जुदा
क्या मुमकिन है कभी करना दिल को धड़कन से जुदा
क्या मुमकिन है कभी करना चाहत को मन से जुदा

गर नहीं ये सब मुमकिन तो मेरे महबूब बता
कैसे कर पाउँगा मै दिल के टुकड़े को दिल से जुदा

क्या तुम भूली मुझे, जब ना था मै पास में तेरे
क्या तुमने खोया मुझे एक पल भी, जब अपने थे तुम्हे घेरे
क्या ना सोचा कभी तुमने की काश तुम हो पाते मेरे
क्या ना चाहा कभी तुमने की दूर होजाएं ये अँधेरे

गर हुआ है अब तक यही तो मेरे महबूब बता
कैसे बसेगी अलग दुनिया, जब हमारा एक है खुदा


वैभव मैत्रेय 

2 comments:

  1. यह दर्द है उन किनारों का जो न मिले न मिल सकेंगे
    यह दर्द है उन अफ़सानों का जो जुबां पर तो आये पर लबों तक नहीं
    यह दर्द है उन टूटे सितारों का जो ख़ुद को मिटा कर औरों की खवाइश पूरी करते रहे
    वर्ना इन शब्दों में दर्द की गहराई कहाँ से आती... वो दर्द हे जो तेरे शब्दों में ख़ूबसूरती है वर्ना जुबां तो सबके पास हे

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  2. bahut hi khoobsurat..lafzon mein gehrayi hai..

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