Monday, 26 September 2011

ज़िन्दगी क्या है?

जब भी में ज़िन्दगी के बारे में सोचता हूँ
चारो और परिभाषाओं को खोजता हूँ

क्या ये ज़िन्दगी रात की रानी है
जीवन जिसका एक रात की कहानी है

या ये ज़िन्दगी कहीं बहता हुआ पानी है
जो न ख़त्म हो वो जवानी है

जब भी में ज़िन्दगी के बारे में सोचता हूँ
चारो और परिभाषाओं को खोजता हूँ

ज़िन्दगी दौड़ती हुई कोई बस भी नहीं
जिसमे चढ़ता उतरता है हर कोई

ज़िन्दगी किसी सिगरट का धुआं भी नहीं
जिसके कश खींचता है हर कोई

जब भी में ज़िन्दगी के बारे में सोचता हूँ
चारो और परिभाषाओं को खोजता हूँ

शायद ज़िन्दगी कोई हसीना हैं
गर्मी में बहता हुआ पसीना है

ज़िन्दगी कविता भी तो हो सकती है
वो कविता जो भावार्थ को खोजती है

ज़िन्दगी चाय का प्याला सा लगती है
सर्द रातों में गर्म उजाला सा लगती है

जब भी में ज़िन्दगी के बारे में सोचता हूँ
चारो और परिभाषाओं को खोजता हूँ

कोशिश करता हूँ न बांधने की परिभाषाओं में इसे
जीना भरपूर ज़रूरी है कर पल के जिसे

जब भी में ज़िन्दगी के बारे में सोचता हूँ

"वैभव मैत्रेय"

 

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