Wednesday, 28 September 2011

हम क्या चाहते

हम क्या चाहते, हम क्या करते
ये दो अलग अलग बातें थी

कम पढ़ते और खेलते ज्यादा
ऐसी कुछ अपनी आदत थी 

बचपन बीता खेल खेल में
याद जो आई आज हमें
वो लड़कपन की बातें थी

हम क्या चाहते हम क्या करते
ये दो अलग अलग बातें थी

आई जवानी हुआ बेचैन दिल
हर वक़्त जिसे समझाते हम
हुए छोटे दिन और लम्बी रातें थी

कितने ही चेहरे अपने से लगते
हर एक अदा मतवाली थी

फिर दिल ने चाहा , एक हमराज़ हो अपना
बस शुरू की फिर कुछ मुलाकातें थी

हम क्या चाहते हम क्या करते
ये दो अलग अलग बातें थी

माँ बोली इंजिनियर बनना, पिता ने डॉक्टर
हमने कंप्यूटर को पकड़ा
और बैठे बटन दबाते थे

एक दिन छुटा साथ भी उनका
मिला उन्हें भी जो था उनका
शायद वो गैर की अमानत थी

हम क्या चाहते हम क्या करते
ये दो अलग अलग बातें थी


जो आई फिर ज़िन्दगी में हमारी
वो जन्म जन्म की साथी थी

हुई सब बीती बातें फिर तो
जब बैठ के वो बतियाती थी

हम क्या चाहते हम क्या करते
ये दो अलग अलग बातें थी

आज भी देखूं जो मुड़कर पीछे
नज़र यही बस आता है
जो मैं समझा कोशिश अपनी
वो उस इश्वर की सौगातें थी

हम क्या चाहते हम क्या करते
ये दो अलग अलग बातें थी

"वैभव मैत्रेय"





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