Monday, 4 June 2012

दिल की क्यों न कभी सुनी थी मैंने

दिल की क्यों न कभी सुनी थी मैंने 
आज अचानक सोचा तो ये जाना मैंने 

हम जो चाहते थे हमेशा पाना 
हम चाहते थे जिस डगर पे जाना 
वो दिल से होकर ही है जाती
नहीं फिर क्या हमें ये एहमियत समझ में आती 

क्यों हर बार फैसला दिमाग ही है करता 
क्यों हर रोज़ ये दिल बेचारा, तिल तिल के है मरता
 
किस शै से है हर बार तू डरता
 

एक बार दिल के कही, करके तो देख 
एक बार गिर कर फिर संभल कर तो देख

एक बार तो बहने दे  किनारों के ज़िन्दगी को

एक बार तो दिखा तू भी दिया इस रौशनी को 


क़यामत खुद कायनात बन जाएगी
मौत फिर नयी ज़िन्दगी सजाएगी
दुनिया और रोमानी हो जाएगी
तेरी ज़िन्दगी, दुनिया में एक मिसाल बन जाएगी
न किसी का खौफ होगा, न कोई अफ़सोस होगा
न कल की कोई चिंता, न आज पर फिर तुझे कोफ़्त होगा

एक बार इ दोस्त इस दिल की भी
एक बार कर प्यार, एक बार नए ख्वाब बुनले


"वैभव मैत्रेय"




13 comments:

  1. कल 07/06/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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    1. मुझे ख़ुशी है कि मेरी रचना आपको पसंद आई

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  2. अच्छी ब्लॉग, सुन्दर कविता.. वाकई सृजनात्मकता की कोई सीमा नहीं..

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    1. thanks Madhuresh for all the appreciation

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  3. वाह ...बहुत ही बढि़या।

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    1. शुक्रिया

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    2. मुझे ख़ुशी है कि मेरी रचना आपको पसंद आई

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  4. दिल से लिए फैंसले कई बार भावना के फैंसले होते हैं ... दिमाग में जिनका कोई काम नहीं ... अच्छी रचना है ...

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    1. शुक्रिया दिगंबर जी

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  5. Replies
    1. धन्यवाद हबीब साहब

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