Monday, 19 March 2012

एक लम्हा

एक लम्हा कर गया नम कल क्यों आँखें मेरी
ख़ामोशी छागयी क्यों हर ओर, जब याद आई तेरी

न चाहा था मैंने सोचना, उस वक़्त बारे में तेरे
न चाहा था मैंने देखना, जिस वक़्त चेहरे को तेरे
फिर क्यों अचानक ये मंज़र बदल सा गया
फिर क्यों ये दिल तुझे पाने को मचल सा गया
लोगों की उस भीड़ में, आज मैं क्यों तनहा था
ज़िन्दगी के इन सवालों पर आज फिर से हैरां था

तुम तो मसरूफ थे अपनों में अंजानो की तरह
क्यों न सुन पाए तुम आज वो सिसकियाँ मेरी
एक लम्हा कर गया नम कल क्यों आँखें मेरी

वैभव मैत्रेय



4 comments:

  1. संतृप्त कहूं के अतृप्त कहूं

    अब तू ही बता मैं क्या कहूं

    शब्दों से बुनी इस चादर के

    इन रंगों को मैं क्या कहूं



    कहीं कल कल करता संगीत है

    कहीं मौजों की चंचलता है

    कहीं पपीहे जैसी प्यास है

    कहीं सपने ही पर्याप्त हैं



    कहतें हैं के सपने छलावा हैं

    बंद आँखों का एक दिखावा है

    कम्ज़र्फ़ हैं वोह जो जानते नहीं

    अस्तित्व भी तो सपनो का आइना है



    पर कौन पड़े इस विवाद में

    बहता तू प्रेम के दरिया में

    उसका इक एहसास ही काफ़ी है

    बाकी तो सब बेमानी है

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  2. बस इक लम्हा.......

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    1. @Punam ji....ek lamhe ki ehamiyat samajhiye....kyunki life mein bahut se aise lamhe ek - ek kar aate hain

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  3. वाह! बहुत खुबसूरत एहसास पिरोये है अपने......

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