डूबा मै, डूबा क्यों,
डूबने से ना आज डरा क्यों
जाना मै, ना जाने तू,
उस ईश का ही मै अंश हूँ
एक हवा का झोंका मुझको, लेगया बादलों के पार
यहाँ के सारे रिश्ते छोड़े, छोड़ चला संसार
कर रहा मै आज दर्शन, देवो के महादेव का
जाने मैंने राज़ सारे, इस आत्मा अभेद का
क्यों फंसा इस चक्र में, मै भी औरों की तरह
क्यों रचा ये चक्र्व्हू हर बार इश्वर इस तरह
डूबा मै, डूबा क्यों,
डूबने से ना आज डरा क्यों
जाना मै, ना जाने तू,
उस ईश का ही मै अंश हूँ
हर दुःख मुझमे लीन था अब
और सुख का ना आभास रहा जब
एक लौ मुझमे प्रकट हुई और मै प्रकाश में खो गया
लगा मानो, दिनों से जागा, मै गहरी नींद में सो गया
अब ना कोई संगी मेरा, साथी भी सब भूल गया
एक अदृश्य आवाज़ में ही मै ना जान क्यों खो गया
क्या विचित्र वो लोक था,
ना संताप ना कोई शोक था
हर और अदम्य शान्ति थी
ना कहीं भी कोई क्रांति थी
ना मनुष्यों का कहीं शोर था
हर आत्म अपने में लीन था
डूबा मै, डूबा क्यों,
डूबने से ना आज डरा क्यों
जाना मै, ना जाने तू,
उस ईश का ही मै अंश हूँ
फिर ये अचानक क्या हुआ, सारा दृश्य कैसे बदल गया
मै नहीं था कहीं भी लेकिन गिरा और जैसे संभल गया
हो गया आज धन्य मै, देख कर उस विराट को
लाउ कहाँ से शब्द मै, व्यक्त करूँ कैसे उस ललाट को
वो परिभाषाओं से कोसों दूर है
उसके समक्ष है अथाह शान्ति और एक गज़ब का नूर है
देखते ही देखते मुझ ही में वो कहीं खो गया
मेरा सोना, तेरी कृपा से आज धन्य हो गया
जाना मै, ना जाने तू,
उस ईश का ही मै अंश हूँ
वैभव मैत्रेय
very nice poem ,lovely thought process:)
ReplyDeleteEven if it was a dream you saw the sublime through this subconscious spiritual journey
ReplyDeleteNo Sandeep, it was not a dream, this is what I am experiencing these days
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