एक अद्भुत सा एहसास है
चाहे ना कुछ भी मेरे पास है
लेकिन फिर भी मन में उल्हास है
एक शांति चारों और है
मुझे थामे एक अद्रश्य डोर है
ना ये प्रातः है, ना भोर है
ना हो रहा कोई शोर है
एक अद्भुत सा एहसास है
चाहे ना कुछ भी मेरे पास है
लेकिन फिर भी मन में उल्हास है
एक बूंद अमृत मैंने पा लिया
मानो आज गंगा नहालिया
ना दिख रहा कोई छोर है
आज बुद्ध ही बुद्ध हर ओर है
ये दृश्य अति विभोर है
मै आज तृप्त हो गया
एक गहरी नींद में सो गया
क्यों भाव शून्य हो गया
एक वरिष्ट कैसे शिशु हो गया
ये देवों का आगाज़ है
जो ब्रह्म मुझ में व्याप्त है
किया उसी ने सृष्टी निर्माण है
एक अद्भुत सा एहसास है
चाहे ना कुछ भी मेरे पास है
लेकिन फिर भी मन में उल्हास है
मै बंद आँखों से देखता
हर लोभ से अपने को समेटा
मै कर रहा एक विश्व भ्रमण
बिना मूल्य का अद्भुत विचरण
ये जो देख रहा क्या वोह सत्य है
क्या ये अप्सराओं का ही नृत्य है
क्या मै भी आज स्वर्ग में हूँ
या भविष्य के किसी गर्भ में हूँ
मै कैसे बन गया शिवा
मैंने कब ये अमृत पिया
हर पाप से मै आज दूर हूँ
मै आज कदापि ना मजबूर हूँ
येही क्या ब्रह्म ज्ञान है
इश्वर हम ही में विद्यमान है
एक अद्भुत सा एहसास है
चाहे ना कुछ भी मेरे पास है
लेकिन फिर भी मन में उल्हास है
वैभव मैत्रेय
चाहे ना कुछ भी मेरे पास है
लेकिन फिर भी मन में उल्हास है
एक शांति चारों और है
मुझे थामे एक अद्रश्य डोर है
ना ये प्रातः है, ना भोर है
ना हो रहा कोई शोर है
एक अद्भुत सा एहसास है
चाहे ना कुछ भी मेरे पास है
लेकिन फिर भी मन में उल्हास है
एक बूंद अमृत मैंने पा लिया
मानो आज गंगा नहालिया
ना दिख रहा कोई छोर है
आज बुद्ध ही बुद्ध हर ओर है
ये दृश्य अति विभोर है
मै आज तृप्त हो गया
एक गहरी नींद में सो गया
क्यों भाव शून्य हो गया
एक वरिष्ट कैसे शिशु हो गया
ये देवों का आगाज़ है
जो ब्रह्म मुझ में व्याप्त है
किया उसी ने सृष्टी निर्माण है
एक अद्भुत सा एहसास है
चाहे ना कुछ भी मेरे पास है
लेकिन फिर भी मन में उल्हास है
मै बंद आँखों से देखता
हर लोभ से अपने को समेटा
मै कर रहा एक विश्व भ्रमण
बिना मूल्य का अद्भुत विचरण
ये जो देख रहा क्या वोह सत्य है
क्या ये अप्सराओं का ही नृत्य है
क्या मै भी आज स्वर्ग में हूँ
या भविष्य के किसी गर्भ में हूँ
मै कैसे बन गया शिवा
मैंने कब ये अमृत पिया
हर पाप से मै आज दूर हूँ
मै आज कदापि ना मजबूर हूँ
येही क्या ब्रह्म ज्ञान है
इश्वर हम ही में विद्यमान है
एक अद्भुत सा एहसास है
चाहे ना कुछ भी मेरे पास है
लेकिन फिर भी मन में उल्हास है
वैभव मैत्रेय
प्यासा था वो जो आज तृप्त है
ReplyDeleteतृप्त था वो जो आज संतृप्त है
यह तेरी नहीं देवताओं की है माया
के नहीं है तुझ पर आज त्रिश्नागी की छाया
परन्तु यह जीवन है मोह का जंजाल
आत्मा फसी है जिसके अंतराल
कब कौन सी प्यास जागृत कर जाए
और फिर अतृप्त कर जाये माया का काल
लेकिन कल की सोच क्यों निरादर करता है आज का
झूम ले इन अप्सराओं के समक्ष भोग ले इस स्वर्गीय शांति को
येही है समय की मांग... येही है तेरी पहचान