Monday, 23 January 2012

रचनाकार

तुही है इस जग का, रचनाकार
तुही है हम सब का, पालनहार

तेरी ही प्रेरणा से हो रहा, विश्व विस्तार
तेरी ही कल्पना से है उपजा, ये सारा संसार

मै तो छोटी सी, इस बूंद सागर में
मै तो हलकी सी, एक प्यास गागर में

घर से बाहर देखि, दुनिया विचित्र सी है
मीरा चाहे गिरधर को, उतनी पवित्र सी है
चाहे कालक लगे शरीर पर, मगर उजले चरित्र सी है
मन में बसे तेरे, सुन्दर चित्र सी है

मै क्या बतलाऊ तुझे ये अनुभव कैसा है
मै क्या कहू तुम्हे, मेरा प्रेम ये कैसा है

मेरे शब्द हो गए हैं आज, निराधार
तुही है इस जग का, रचनाकार
तुही है हम सब का, पालनहार

वैभव मैत्रेय

2 comments:

  1. What an ode to your creator... what an acknowledgement of your existence... what a belief... what an experience... reflected in the mirror of words you have created in praise of your srijanhaar...amazing...God bless

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  2. Thank you so very much Sandeep bhai. This is my own experience of the divine

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